Wednesday, 9 November 2016

पैगाम

मैं तुम्हारी, मेरी मोहोब्बत तुम्हारी

मेरा दिल तुम्हारा, मेरी जान भी  तुम्हारी

मेरा  सवेरा तुम्हारा, मेरी हर शाम तुम्हारी

मेरा जिस्म  तुम्हारा,  मेरी रूह भी तुम्हारी

ये  होंठ तुम्हारे, यह आंखे  तुम्हारी

मेरे कापते  हाथ तुम्हारे, पैरों में बंधी पायल की झंकार भी तुम्हारी

मेरा मन जो पुकारता है वो नाम तुम्हारा, मेरे रग रग मे  छपी है तस्वीर तुम्हारी

मेरी धड़कनो का हर कतरा तुम्हारा, मेरी साँसों की रफ़्तार भी तुम्हारी

मैंने जो बोया है वो ख्वाब तुम्हारा, और जो गाये है  गीत उनकी हर सरगम तुम्हारी

मेरे अश्क तुम्हारे, ये खिलखिलाती हँसीं की गूंज भी तुम्हारी

मेरा निखरता रूप तुम्हारा, मेरे सवरने की वजह तुम्हारी

मेरा नूर और श्रृंगार तुम्हारा, मेरे चेहरे की उदासी भी तुम्हारी

मुझे है सिर्फ एहसास तुम्हारा, जो दिखती है मुझे दिन रात वो छवि तुम्हारी

मेरा संसार तुम्हारा, जिस में मैं खोयी हूँ वो दुनिया भी तुम्हारी

जो  मुझमे बहता है वो रक्त तुम्हारा, जो बसी है मेरे रोम रोम में वो चाहत तुम्हारी

मैं तुम्हारी, मेरी मोहोब्बत भी तुम्हारी