Saturday, 15 October 2016

एक चिड़िया

एक चिड़िया उड़ी आकाश में, आशाओं के पर लिये अरमानों के जहाँ में,
पहली पहली बार उसने भरी ये उडा़न है,
गिर न जाये कहीं ये डर है उसे, फिर भी होठों पे मुस्कान है,
हैरान हूँ मैं उसका ये आत्मविश्वास देख के, अभी तो वो बस नन्ही सी ही जान है।


जाने से पहले वो बोली माँ से, उड़ना चाहती हूँ मैं माँ, परों को फैला के खेलना चाहती हूँ,
नीले गगन की गहरायी में खोना चाहती हूँ, आसमान की गोद में सोना चाहती हूँ,
हवा की छुवन को महसूस करना चाहती हूँ, अपनी खुद की आँखों से ये जहाँ  देखना चाहती हूँ,
माँ मैं आकाश के उस पार जाना चाहती हूँ, मैं जीना चाहती हूँ माँ मैं जीना चाहती हूँ।


आँखों में उसके उमंग की लहर थी, सूरज की रौशनी सी चमक थी और एक सुनहरा सा रंग था,
बोली अब मैं चलती हूँ नए सफर में सजने को, वक़्त लगेगा मुझको इस अनजान दुनिया में ढलने को,
कह के माँ को अलविदा लग गयी वो गले से, नमी तो आयी आंखों में पर आंसू न दिए गिरने उसने,
सहमी सी थी थोड़ी वो, लेकिन खोल दिए थे पर उसने, भरदी थी पहली उड़ान अब पहन के सपनो के गहने।


डगमगाई ज़रा सी, थरथराई वो डर से जब देखा बड़े परिंदो को आते जाते,  
फिर मुस्कुरायी वो देख के उनको भी खुद के जैसे ही पर फैलाते,
अब कोई डर न रहा उसे, पहली हिम्मत ने दिया है रंगबिरंगा आसमान उसे,
झूम उठी वो, नाचने लगी वो, भर के उन नज़ारों को आँखों में बोली वो, आज मिल गया पूरा जहाँ मुझे।


देखे उसने प्रकृति के रूप रंग, खोयी घटाओं में और खेली वो नदियों, पेड़ों, बादलों के संग,
उड़ती रही वो, लहराती रही वो, ख़ुशी के बोल गुनगुनाती रही है वो,
ऐसा खिल गया चेहरा उसका देख के सतरंग इन्द्रधनुष, जैसे आज से पहले उसने  कभी ख़ुशी ना जानी थी,
हौसले की उसमे कमी नहीं, थक के भी वो थमी नहीं, जी रही थी वो हर ख्वाइश,मन में जो ठानी थी।

शुरू हो गया है सफर उसका, अब रुकना नामुमकिन है,
दूर है जाना उसको, उसका सफर ही उसकी मंजिल है,
ढूंडा उसने खुद को इस सपनो के नगर में, जाना की यही उसकी सच्ची पहचान है,
जोश से भरी उड़ती रही वो, हर एक पल को ऐसे जिया जैसे पूरा आकाश उसका मकान है  ।













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