Wednesday, 21 September 2016

गड़बड़

रहना है मुझे बस अब यूँही बन्द घर के अन्दर, क्योंकि जाता हूँ  गर मै बाहर तो हो जाती है गड़बड़,

जानता हूँ आप लोगों को यूँ  ही नही होगा विश्वास मुझपर, सुनाता हूँ  कुछ किस्से, बतलाता हूँ आप बीती,

फिर हो जाएगा खुद ही दूध  का दूध और पानी का पानी।




सुबह -सुबह जब सैर को निकला पहन के ट्रैक सूट, गलती से शुक्ला जी के हाथों से टॉमी गया छूट,

जॉगिंग करने निकला था पर दौड़ गया मै मैरेथौन, निकल गया दम हाँफ-हाँफ के,

बेहोश हो गया खाके तेज चक्कर, ऊपर से लगाने पड़े पेट मे चौदाह बड़े इन्जैक्शन।




छुट्टी के दिन गया पड़ोस मे करने को थोड़ी गपशप, थोड़ी खीखी हाहा,

चाय का सिप लेते ही जो घुली चाशनी मुूँह मे, मच गयी मचमच-लचपच,

 ऐसा लगा कि  जैसे शर्मा जी ने खोल दिया हो घर मे चीनी का कारखाना,

पूछने पे अम्मा कहती है कि, बिटुआ, डाले थे बस चीनी तीन बड़े चम्मच।




कान मे मशीन लगी है, सुनता जरा हूँ ऊूँचा, इसलिए सुन न पाया गैस पे चड़े कूकर की सीटी,

जल गये चावल, दाल छितर गयी हर जगह, दीवार हो गयी काली,

डिनर की हो गयी ऐसी की तैसी, कूकर हो गया स्वर्गवासी,

बस घर से बाहर ही तो झाँक रहा था जो पड़ गया मुझको भारी।




 मन्थ एन्ड में बैठा घर पे देख रहा था टी.वी., बजी फ़ोन की घंटी, निकला अपना दोस्त पुराना,

बोला मिलते हैं लंच पे कहीं, बहोत दिन  हो गये यारा,

लग के गले यार के अपने मै भूल गया दुख सारा, खूब चाव से खाना खाया, करीं पुरानी यादें ताजा,

जब बिल देने की बारी आयी तो हो गये मियां बलजीत नौ दो ग्यारा।




डर के मारे कई दिनों तक बैठा रहा मै घर पर, फिर सोचा ये सब मन का भ्रम है,अन्धविश्वास का है घोर चक्कर,

उसी शाम को झोला लेके मार्केट पहुंचा मै लेने सब्जी तरकारी,

दिखा दिए दिन मे तारे मुझको, याद दिला दी  मेरी नानी,

जब लाल टमाटर देख के भईया, बैल ने वो जोर से सींग मारी।




संडे का दिन था, मजे मे था अखबार के पन्ने पलट कर,

खा रहा था दही जलेबी, तभी पहुूँच गये सिन्हा जी लेके अपनी पंचर स्कूटर,

बोले इसको ठीक करवादो, जाना पड़ रहा है आज भी मुझको दफ्तर,

मैने भी हाँ करदी आखिर एक पड़ोसी ही तो होता है दूसरे पड़ोसी का हमदर्द,

ब्रेक फेल हो गया जब लौट रहा था बनवा के गाड़ी का पंचर, ढीले हो गये साथ गाड़ी के मेरे भी सारे अंजर पंजर।




घायल पड़ा हूँ  घर पे खाट तोड़ता अब मैं,

शर्मा, शुक्ला, बलजीत, मिश्रा, गुप्ता और सिन्हा, देख रहे हैं हालत को मेरी बना के गोल घेरा,

पड़े-पड़े यही सोच रहा हूँ मै पंडित  बेचारा,

अब आगे न जाने, क्या हो मंजर, खड़ा हो किस आफत का अखाड़ा,

कोई और काम नही था तो लिख डाला मैंने अपना दुखड़ा।




जब भी बाहर न जाना चाहा तो चला न कोई बहाना,

बल्कि हर बार  मुझ पर मेरा ही दावँ पड़ गया उल्टा,

और देखो यारों बदल गया है अब मेरे जीवन का नजारा,

लिख दिया  है मनैे सब कुछ आपको मान के अपना,

आप पड़ेंगे तो कविता कहेंगे पर इसे सहने मे मेरा तो निकल गया तेल सारा।  

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