Wednesday, 9 November 2016

पैगाम

मैं तुम्हारी, मेरी मोहोब्बत तुम्हारी

मेरा दिल तुम्हारा, मेरी जान भी  तुम्हारी

मेरा  सवेरा तुम्हारा, मेरी हर शाम तुम्हारी

मेरा जिस्म  तुम्हारा,  मेरी रूह भी तुम्हारी

ये  होंठ तुम्हारे, यह आंखे  तुम्हारी

मेरे कापते  हाथ तुम्हारे, पैरों में बंधी पायल की झंकार भी तुम्हारी

मेरा मन जो पुकारता है वो नाम तुम्हारा, मेरे रग रग मे  छपी है तस्वीर तुम्हारी

मेरी धड़कनो का हर कतरा तुम्हारा, मेरी साँसों की रफ़्तार भी तुम्हारी

मैंने जो बोया है वो ख्वाब तुम्हारा, और जो गाये है  गीत उनकी हर सरगम तुम्हारी

मेरे अश्क तुम्हारे, ये खिलखिलाती हँसीं की गूंज भी तुम्हारी

मेरा निखरता रूप तुम्हारा, मेरे सवरने की वजह तुम्हारी

मेरा नूर और श्रृंगार तुम्हारा, मेरे चेहरे की उदासी भी तुम्हारी

मुझे है सिर्फ एहसास तुम्हारा, जो दिखती है मुझे दिन रात वो छवि तुम्हारी

मेरा संसार तुम्हारा, जिस में मैं खोयी हूँ वो दुनिया भी तुम्हारी

जो  मुझमे बहता है वो रक्त तुम्हारा, जो बसी है मेरे रोम रोम में वो चाहत तुम्हारी

मैं तुम्हारी, मेरी मोहोब्बत भी तुम्हारी

Saturday, 15 October 2016

एक चिड़िया

एक चिड़िया उड़ी आकाश में, आशाओं के पर लिये अरमानों के जहाँ में,
पहली पहली बार उसने भरी ये उडा़न है,
गिर न जाये कहीं ये डर है उसे, फिर भी होठों पे मुस्कान है,
हैरान हूँ मैं उसका ये आत्मविश्वास देख के, अभी तो वो बस नन्ही सी ही जान है।


जाने से पहले वो बोली माँ से, उड़ना चाहती हूँ मैं माँ, परों को फैला के खेलना चाहती हूँ,
नीले गगन की गहरायी में खोना चाहती हूँ, आसमान की गोद में सोना चाहती हूँ,
हवा की छुवन को महसूस करना चाहती हूँ, अपनी खुद की आँखों से ये जहाँ  देखना चाहती हूँ,
माँ मैं आकाश के उस पार जाना चाहती हूँ, मैं जीना चाहती हूँ माँ मैं जीना चाहती हूँ।


आँखों में उसके उमंग की लहर थी, सूरज की रौशनी सी चमक थी और एक सुनहरा सा रंग था,
बोली अब मैं चलती हूँ नए सफर में सजने को, वक़्त लगेगा मुझको इस अनजान दुनिया में ढलने को,
कह के माँ को अलविदा लग गयी वो गले से, नमी तो आयी आंखों में पर आंसू न दिए गिरने उसने,
सहमी सी थी थोड़ी वो, लेकिन खोल दिए थे पर उसने, भरदी थी पहली उड़ान अब पहन के सपनो के गहने।


डगमगाई ज़रा सी, थरथराई वो डर से जब देखा बड़े परिंदो को आते जाते,  
फिर मुस्कुरायी वो देख के उनको भी खुद के जैसे ही पर फैलाते,
अब कोई डर न रहा उसे, पहली हिम्मत ने दिया है रंगबिरंगा आसमान उसे,
झूम उठी वो, नाचने लगी वो, भर के उन नज़ारों को आँखों में बोली वो, आज मिल गया पूरा जहाँ मुझे।


देखे उसने प्रकृति के रूप रंग, खोयी घटाओं में और खेली वो नदियों, पेड़ों, बादलों के संग,
उड़ती रही वो, लहराती रही वो, ख़ुशी के बोल गुनगुनाती रही है वो,
ऐसा खिल गया चेहरा उसका देख के सतरंग इन्द्रधनुष, जैसे आज से पहले उसने  कभी ख़ुशी ना जानी थी,
हौसले की उसमे कमी नहीं, थक के भी वो थमी नहीं, जी रही थी वो हर ख्वाइश,मन में जो ठानी थी।

शुरू हो गया है सफर उसका, अब रुकना नामुमकिन है,
दूर है जाना उसको, उसका सफर ही उसकी मंजिल है,
ढूंडा उसने खुद को इस सपनो के नगर में, जाना की यही उसकी सच्ची पहचान है,
जोश से भरी उड़ती रही वो, हर एक पल को ऐसे जिया जैसे पूरा आकाश उसका मकान है  ।













Wednesday, 21 September 2016

गड़बड़

रहना है मुझे बस अब यूँही बन्द घर के अन्दर, क्योंकि जाता हूँ  गर मै बाहर तो हो जाती है गड़बड़,

जानता हूँ आप लोगों को यूँ  ही नही होगा विश्वास मुझपर, सुनाता हूँ  कुछ किस्से, बतलाता हूँ आप बीती,

फिर हो जाएगा खुद ही दूध  का दूध और पानी का पानी।




सुबह -सुबह जब सैर को निकला पहन के ट्रैक सूट, गलती से शुक्ला जी के हाथों से टॉमी गया छूट,

जॉगिंग करने निकला था पर दौड़ गया मै मैरेथौन, निकल गया दम हाँफ-हाँफ के,

बेहोश हो गया खाके तेज चक्कर, ऊपर से लगाने पड़े पेट मे चौदाह बड़े इन्जैक्शन।




छुट्टी के दिन गया पड़ोस मे करने को थोड़ी गपशप, थोड़ी खीखी हाहा,

चाय का सिप लेते ही जो घुली चाशनी मुूँह मे, मच गयी मचमच-लचपच,

 ऐसा लगा कि  जैसे शर्मा जी ने खोल दिया हो घर मे चीनी का कारखाना,

पूछने पे अम्मा कहती है कि, बिटुआ, डाले थे बस चीनी तीन बड़े चम्मच।




कान मे मशीन लगी है, सुनता जरा हूँ ऊूँचा, इसलिए सुन न पाया गैस पे चड़े कूकर की सीटी,

जल गये चावल, दाल छितर गयी हर जगह, दीवार हो गयी काली,

डिनर की हो गयी ऐसी की तैसी, कूकर हो गया स्वर्गवासी,

बस घर से बाहर ही तो झाँक रहा था जो पड़ गया मुझको भारी।




 मन्थ एन्ड में बैठा घर पे देख रहा था टी.वी., बजी फ़ोन की घंटी, निकला अपना दोस्त पुराना,

बोला मिलते हैं लंच पे कहीं, बहोत दिन  हो गये यारा,

लग के गले यार के अपने मै भूल गया दुख सारा, खूब चाव से खाना खाया, करीं पुरानी यादें ताजा,

जब बिल देने की बारी आयी तो हो गये मियां बलजीत नौ दो ग्यारा।




डर के मारे कई दिनों तक बैठा रहा मै घर पर, फिर सोचा ये सब मन का भ्रम है,अन्धविश्वास का है घोर चक्कर,

उसी शाम को झोला लेके मार्केट पहुंचा मै लेने सब्जी तरकारी,

दिखा दिए दिन मे तारे मुझको, याद दिला दी  मेरी नानी,

जब लाल टमाटर देख के भईया, बैल ने वो जोर से सींग मारी।




संडे का दिन था, मजे मे था अखबार के पन्ने पलट कर,

खा रहा था दही जलेबी, तभी पहुूँच गये सिन्हा जी लेके अपनी पंचर स्कूटर,

बोले इसको ठीक करवादो, जाना पड़ रहा है आज भी मुझको दफ्तर,

मैने भी हाँ करदी आखिर एक पड़ोसी ही तो होता है दूसरे पड़ोसी का हमदर्द,

ब्रेक फेल हो गया जब लौट रहा था बनवा के गाड़ी का पंचर, ढीले हो गये साथ गाड़ी के मेरे भी सारे अंजर पंजर।




घायल पड़ा हूँ  घर पे खाट तोड़ता अब मैं,

शर्मा, शुक्ला, बलजीत, मिश्रा, गुप्ता और सिन्हा, देख रहे हैं हालत को मेरी बना के गोल घेरा,

पड़े-पड़े यही सोच रहा हूँ मै पंडित  बेचारा,

अब आगे न जाने, क्या हो मंजर, खड़ा हो किस आफत का अखाड़ा,

कोई और काम नही था तो लिख डाला मैंने अपना दुखड़ा।




जब भी बाहर न जाना चाहा तो चला न कोई बहाना,

बल्कि हर बार  मुझ पर मेरा ही दावँ पड़ गया उल्टा,

और देखो यारों बदल गया है अब मेरे जीवन का नजारा,

लिख दिया  है मनैे सब कुछ आपको मान के अपना,

आप पड़ेंगे तो कविता कहेंगे पर इसे सहने मे मेरा तो निकल गया तेल सारा।  

Monday, 19 September 2016

कौन है वो - For LOVE, With LOVE and By LOVE

सम्मोहित सी मै खिंची चली जा रही हूँ किस ओर ये, दूर से आती इस मोहक धुन के पीछे पीछे
कौन है वो जो इतनी मधुर बांसुरी सुना रहा  है मुझे?

है कुछ जाना- जाना  सा वो, मुझे कभी न लगा अंजाना सा वो, कुछ इस तरह से है मुझमे समाया सा वो
 कौन है वो, जिसे इतनी शिद्दत से अपनाया है मैंने?

उसके एहसास से ही पिघल रही हूँ, पल-पल उसमे ढल रही हूँ, चाशनी सी घुलती मै कभी फिसल रही हूँ  कभी संभल रही हूँ
कौन है वो जो अपने रंग में यूँ रंगता जा रहा है मुझे?

पाने से पहले पाया है जिसको,चाहत से ज्यादा है चाहा उसको, मेरी आँखों में जो रौशनी है वही साया है उसका
कौन  है वो जो मेरे खाली पन्नों पे अपने हसीं किस्से  लिख रहा है और जिन्हें रोज पढ़ा है मैंने?

जो महसूह हो रहा है वो प्यार शब्द से परे है, जो जीने लगे है हम वो ज़िन्दगी कुछ अलग  है,
कौन है वो जिसके साथ ये सफर इतना सुहाना लगता है मुझे?

मिला था वो एक हवा के झोके जैसा, ठहरा है अब आकाश  के जैसा, बहता है मुझमे सागर के जैसा
कौन है वो जिसे कुछ ऐसे छुआ है मैंने?

रह गया है बाकि बस एक वही, जिसमे मै पूरी खो गयी हूँ कहीं,
कौन है वो जो एक ही रह गया है सब पता मुझे?

कुछ अजब बात है की आज कल उड़ती भी हूँ और डूबती भी, पंख तो फैला ही चुकी थी, पर,
कौन है वो जिसके संग उड़ने के  साथ  डूबना भी  सीखा है मैंने?

रिश्ता ये गहराता जा रहा है, इठलाता सा मन मुझे बहलाता जा रहा है, रचती जा रही हूँ उसकी चाहत में मैं, ऐसा निखार पहली बार  मुझपे  आ रहा है
 कौन है वो जिसने इतनी सुंदरता से  सराहा है मुझे?

अनोखा ये  मिलन है जिसमे खुद को  खोया है और खुद ही को पाया है मैंने
कौन है वो  जिसकी सोंधी सी खुशबू से  खुद को रिझाया है मैंने?

मेरे खिलते चेहरे का तेज और आँखों की चमक प्रकाश है मेरी उज्ज्वलित  रूह का
कौन है वो जिसने अपनी रूह से कुछ ऐसे जोड़ा  है मुझे?

मुझे मुझसे ही महोब्बत हो गयी है जबसे पढ़ा है मैंने मेरा नाम उसकी आँखों में
 कौन है वो जिसकी नजरों मे खुद को पहचाना है मैने?

वही है मेरी ज़मीं और वही मेरा आसमान, उसी में रहना मुझे और उसी के तले सोना है
 कौन है वो जिसके सिवा अब कहीं और ना जा जाना मुझे?

दूर जाता है उसका साया तो मेरा मन सूना हो जाता है, खाली मन में सिर्फ सागर ही  रह  जाता है और आँखों से छलक  जाता है
कौन है वो जिसे कुछ ऐसे आँखों में भरा है और मन में बसाया है मैंने?

मौन सी बैठी चाँद पे मैं, बेसुध सी  हूँ बादलों में गुम, खोयी सी इस अनोखे जहाँ मे सुन रही हूँ अद्भुत कहानिया
 कौन है वो जो दूर कहीं स्वप्न नगरी में  ले जा रहा है मुझे?

दो आत्माओं  का मिलान सुना है सबने, दो जिस्म एक जान सुना है सबने,
कौन है वो जिसमे अपनी ही आत्मा का आधा हिस्सा पाया है मैंने?





























Saturday, 17 September 2016

पहली बारिश


रिमझिम गीतों से महकी ये जो इस पहली बारिश ने झूम मचायी है,

लगता है मुझे भी बहका के बहाा ले जाने आयी है,

मै भी कहााँ रुकना चाहती हूँ, बह जाना चाहती हूँ साथ तेरे,

बस शर्त इतनी सी है कि गर देदूं मै खुद को तुझे,

तो न डुबाना न किनारे पे लाके छोड़ना मुझे,

कुछ ऐसे ले जाना आज कि जैसे बस मुझे पार लगाने आई है।



एहसास है कि तेरे साथ मिट्टी मे लोट मटमैली हो जाऊँगी मै,

कहीं बीच बीच मे कंकड़ पथ्थर से टकराऊँगी मै,

शायद घिसड़ते हुये बहुत चोट भी खाऊँगी मै,

पर जानती हूँ कि धुल जायेंगे सारे दर्द जैसे ही सागर से मिल जाऊँगी मै,

तो क्यों रहे ये डर की दीवार,आके बतादे कि तू मुझे अपनाने के लिये आयी है।



हमेशा तुझे खिड़की पे बैठ के निहारा है मैने, पहले कुछ सहमी सी बादलों से झांकती है तू,

और फिर टिपटिप कर जमीं का मिजाज जांचती है तू,

जब लगता है तुझे कि वक्त सही है तेरा तो पैरों मे घुंगरू बाधंती है तू,

देख के तुझे दौड़ी चली आती हूँ मिलने, जिस तरह से झिम झिम कर के नाचती है तू,

इसलिये कहती हूँ कि तोड़दे इन बन्दिशों को और खुल के नाचले जरा, जैसे घुंगरू को तोड़ के बिखराने आयी है।



पा कर तुझे मै भी मुसकुरा लेती हूँ, तेरी धुन मे थोड़ा सा गुनगुना लेती हूँ,

थिरक लेती हूँ मै भी साथ तेरे, घुंगरू न सही पायल तो छनका लेती हूँ,

और जब अचानक छोड़ के चली जाती है तू, तो घीली मिट्टी मे तेरी खुशबू पा लेती हूँ,

पता नही हर बार क्यों जाना जरूरी है तेरा, जबकि जब भी आती है तू आसमान छोड़ कर,

लगता है जैसे जमीं पे ही बसने के लिये आयी है।



तेरी कुछ बूंदे अभी बाकी थी, सोचा उन्हे भी खुद मे समा लेने दूँ,

फिजा मे कुछ आलम था ऐसा खामोशी थी हर जगह,

गुमसुम सी हंसी होठों पे मेरे, जाने ये कैसी उदासी थी,

कि बूंदे बरसी आखों से मेरी, समायी तू मुझमे कुछ इस तरह,

देख के मेरा दीवानापन वापस से जो बरसी तू,

ऐसा लगा दिल को मेरे कि मुझपे सारी खुशियां लुटाने आयी है।



झूला झूलते हुए बस यही बात समझ आयी मुझे, कितनी पागल थी जो पहले साथ न जा पायी तेरे,

शायद डरती थी बीच मे छूट जाने से कहीं, वरना तूने तो हजारों ख्वाहिशें फरमायी थी,

पर झल्ली तू भी कम नही, देखा मैनै तेरे इकरार मे कितनी गहरायी थी,

बरसती थी तो बस गले लगाने के लिये, चूमती थी तेरी हर बूंद मुझे,

तेरे हर स्पर्श ने यूं भिगोया है मुझे, कि देख आज तेरी ओर खिची चली आयी हूँ,

पर अरमानो के अब इधर भी निकलने लगे हैं, हम भी उड़ने लगे हैं और बहकने लगे हैं,

जो बात अनसुनी रह गयी थी वो सुनने लगे हैं और सुनाने लगे हैं,

आ खोल दे तू भी दिल के राज सभी और दिखादे दुनिया को, कि कम से कम हमे तो महोब्बत रास आयी है।



चल ले चलूँ मै कहीं दूर तुझे, तू नही तो मै ही मांग लेती हूँ तुझे,

साथ रहना है तो छोड़ के आना होगा तुझे,

जंजीरों सा तेरा जहााँ तोड़ के आना होगा तुझे,

फैसला ये कर कि किस ओर जाना है तुझे,

या तो मुंह मोड़ सदा के लिये, या कहदे के साथ आना है तुझे,

एक इशारा बहुत है मुझे, बस कुछ बू्ंद आाँसू ही तो टपकाने है तुझे,

ना देर करके यूं धड़कने बड़ा, छुपा नही है मुझसे कि इश्क है तुझे,

तो चल हाथ पकड़ ले मेरा जैसे कभी न साथ छोड़ने के लिये आयी है।

Friday, 16 September 2016

कविता

कविता क्या है?  

सिर्फ़ विचारों का संकलन है या स्वयं  एक विचार है, 

पन्नो पे लिखी मन की बातों का संग्रह  है,

 ह्रदय से  निकली आह है या खुशियों का प्रदर्शन  है,

 छुपा हुआ है जो दर्द  कहीं उसे  प्रकाशित  करने का माध्यम है।   



कविता क्या है? 

आँखों से  गिरा अश्क है या अश्कों से  बसा  संसार  है,

किलकारियों  की गूँज से  भरा कोई खाली मकान है, 

इसका कोई मोल नहीं, इतने कीमती हैं इसके बोल, कि सारे जहाँ मे ये अनमोल है, 

छू  लेती है मनों को सबके,इसके रूप रंग हजार है।   



कविता क्या है?

 ऐहसास  को शब्दों से और शब्दों को ऐहसास  से  जोड़ती एक रेल है, 

इसके डिब्बों  से  झांकती है ज़िन्दगी, 

कही-अनकही, किस्से -कहानियों का कलात्मक संचय है,

इसके सफर  मे खो जाते हैं सभी, ये सुहाने सपनों का आधार है, 

इस  रेल मे सवार यात्रियों का, जीवन  के रसों  से अनोखा मेल है।



कविता क्या है?

गुरूर मिटाती, नकाब हटाती, तो कभी रिश्तों को खंगालती है, 

कभी करती बगावत, कभी अनुग्रह तो कभी चेतावनी देती मशाल है,

समाज की कुरीतियों और दोषों को बेपर्दा करने का प्रयास है,

 सबके समक्ष सत्य को प्रस्तुत करदे ऐसा ठोस  प्रमाण है, 

सदियों  से जिसने चहरा पड़,मन को टटोल डायरियां भरदी, ऐसा इतिहास है। 


   
कविता क्या है? 

इसके शब्दों  के खेल निराले, पल मे हंसादे पल मे रुलादे,

डर से भरदे या एकदम चौकादे, जाने कब किस  करवट मुड़ जाती है, 

चुलबुली सी इतराती,बहलाती,खुद बहकती और कभी समझाती है 

कुछ भी छिपा नहीं है इससे, खोल के रख देती है दिल के राज सभी,

 चाहे सुख हो या दुख ये सबके जीवन का सार जानती है।

   

कविता क्या है?

 हार माने हुओं का हाथ थाम के हौसला देती उम्मीदों की लहर है, 

कलम की ताकत का प्रयोग करती कटारी तलवार है, 

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, साहस का स्वरुप तथा भावनाओं का विवरण  है, 

और क्या कहूँ इसके बारे मे बस जो धमाल मचादे वो कमाल है,

 जो लिखा  है मैने वो  कविता नहीं, कविता का सुन्दर प्रचार है। 
  I am not God gifted when we talk about writing instead it came within me as an inspiration from seeing my mom or say it's my mom's gift to me and not just writing but also my love for music and dance as well. Where love for stories and lullabies is gifted by my dad.
  My mom used to write stories, articles and poems and get published, which started attracting me and I developed an interest towards writing. I started with writing short stories and since I always loved stories and being imaginative, I started enjoying it more. Slowly it filled passion for writing within me and I got all motivated when my first story was published in a newspaper. I was very little at that time, I don't remember the exact age but not more than 7- 8 years, so it was the most exciting moment for me.   
  That's how my journey into writing started and since then I have been writing poems and stories on and off. I still have my mom's diaries with little torn pages all safe with me, few filled with the poetry written by her and few filled with the old Hindi film songs she loved to write and keep with her. It was different and strange for me as why would someone like to fill pages with the lyrics of already made songs just to keep record. I found it fascinating and even I did the same for a while.  I might never be as good as my mom was, but I enjoy and love what I do write.

One of my best memories with her:

My mom lighting candles on the cake for my 3rd birthday